बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट ने राज्य में 12 वर्षों से बिना मान्यता के संचालित हो रहे प्री-प्राइमरी स्कूलों को लेकर सख्त नाराजगी जताई है। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि बच्चों के भविष्य से इस तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
मामले की सुनवाई के दौरान जब शिक्षा विभाग की ओर से शपथ पत्र में यह बताया गया कि 2013 में लागू हुए नियमों को निरस्त करने का प्रस्ताव है, तो कोर्ट ने तल्ख लहजे में कहा – “बदलाव की तारीख के बाद से ही नया नियम लागू होगा, पुराने अपराध माफ नहीं होंगे।”
कोर्ट ने क्या कहा:
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“12 साल स्कूल बिना मान्यता के कैसे चल गए? ये क्या मजाक है?”
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“जब हमने संज्ञान लिया और सुनवाई शुरू की, तब जाकर सरकार को 2013 के नियम याद आए?”
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“जो लोग बिना अनुमति स्कूल चला रहे थे, उन्होंने माता-पिता और बच्चों के साथ धोखा किया है।”
सरकार पर सवाल:
मुख्य न्यायाधीश ने कमेटी रिपोर्ट पर भी नाराजगी जताई, जिसमें सिर्फ दो दिनों में 12 साल पुराने कानून को बदलने की सिफारिश कर दी गई। उन्होंने कहा कि यह सरकार का पॉलिसी भ्रम और बड़े स्कूल संचालकों को बचाने की कोशिश है।
संभावित कार्रवाई:
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 2013 से पहले से संचालित सभी नर्सरी स्कूलों को मान्यता लेनी थी, और जो बिना अनुमति चलाए गए, उन पर कार्रवाई की जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि बिना अनुमति स्कूल चलाना अपराध है, और इसमें क्रिमिनल केस भी बन सकता है।

