रतनपुर: छत्तीसगढ़ की पौराणिक नगरी, माँ महामाया देवी के कारण पूरे भारत में प्रसिद्ध है। यह मंदिर 52 शक्तिपीठों में से एक है और आदिशक्ति महामाया को समर्पित है। यहाँ देवी को कोशलेश्वरी के नाम से भी पूजा जाता है, जो प्राचीन दक्षिण कोशल (वर्तमान छत्तीसगढ़) की अधिष्ठात्री देवी हैं।
मंदिर का इतिहास
माँ महामाया मंदिर का निर्माण राजा रत्नदेव प्रथम ने 11वीं शताब्दी (1050 ई.) में कराया था। कथा है कि 1045 ई. में राजा रत्नदेव प्रथम ने मणिपुर गाँव (वर्तमान रतनपुर) में एक वट वृक्ष के नीचे दिव्य प्रकाश देखा। उस स्थान पर देवी महामाया की सभा लगी थी। इस अद्भुत दृश्य ने उन्हें चमत्कृत कर दिया और तभी उन्होंने रतनपुर को अपनी राजधानी बनाकर माँ महामाया का भव्य मंदिर बनवाया।
बाद में, विक्रम संवत 1552 में मंदिर का पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार किया गया। इसका स्थापत्य कला अद्वितीय है। गर्भगृह और मंडप को एक सुदृढ़ प्रांगण से घेरा गया है, जिसे 18वीं शताब्दी के अंत में मराठा शासनकाल में किलेबंद किया गया।
शक्तिपीठ की मान्यता
शास्त्रों में वर्णित है कि माता सती के अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ शक्तिपीठ बने। रतनपुर स्थित इस स्थल पर माता का दाहिना स्कंध गिरा था। भगवान शिव ने स्वयं इसे कौमारी शक्तिपीठ का नाम दिया। इसी कारण यह स्थान माँ के 51 शक्तिपीठों में गिना जाता है।
नवरात्र के अवसर पर यहाँ विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है। मान्यता है कि यहाँ की गई पूजा कभी निष्फल नहीं जाती।
त्रिदेवी की उपस्थिति
मूल रूप से यह मंदिर तीन देवियों — महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती — को समर्पित था। समय के साथ महाकाली का अलग मंदिर बन गया और वर्तमान मंदिर मुख्यतः देवी महालक्ष्मी और महासरस्वती के लिए जाना जाता है।
काल भैरव की भूमिका
माँ महामाया मंदिर के रक्षक के रूप में काल भैरव की विशेष मान्यता है। महामाया मंदिर जाने वाले श्रद्धालु अपनी यात्रा तभी पूर्ण मानते हैं, जब वे काल भैरव मंदिर में पूजा अर्चना कर आते हैं।
आस्था और आभा
आज भी सुबह से देर रात तक मंदिर परिसर में भक्तों का तांता लगा रहता है। रतनपुर सिर्फ एक नगर नहीं, बल्कि माँ महामाया की नगरी है। यहाँ के तालाब, मंदिर और ऐतिहासिक धरोहर इस स्थान को और भी पवित्र और आकर्षक बनाते हैं।

