बिलासपुर। त्योहार का मौसम हमेशा खुशियों का होता है। तीजा पर्व पर बेटियाँ मायके लौटती हैं, परिवार एकजुट होता है और समाज में रौनक छा जाती है। मगर इस बार बिलासपुर की सड़कों पर जो नज़ारा सामने आया, उसने त्योहार की मिठास में कड़वाहट घोल दी।
वर्दीधारी पुलिसकर्मी खुलेआम वाहनों को रोकते दिखे। न संवेदनशीलता, न इंसानियत— त्योहार मनाने निकली महिलाएँ और बेटियाँ हाथ जोड़कर कहती रहीं, “साहब, जाने दो… त्योहार है”, लेकिन पुलिस का रवैया कठोर बना रहा। कई पिता अपनी बेटियों को साथ लेकर गुहार लगाते रहे और अंततः जेब ढीली करनी पड़ी।
सरकार लगातार बेटी बचाओ, महिला सम्मान जैसे नारे देती है, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट दिखाई दी। सवाल उठता है कि त्योहार के दिन पुलिस का काम जनता की सुरक्षा और सहूलियत सुनिश्चित करना होना चाहिए था या फिर सड़कों को “वसूली चौकी” में बदल देना?
थाना प्रभारी भी अनजान
जानकारी के अनुसार, संबंधित थाना प्रभारी को यह तक पता नहीं था कि कितने चालान काटे गए। इससे यह शंका और गहरी हो गई है कि यह कार्रवाई ट्रैफिक सुधार का हिस्सा थी या फिर केवल वसूली अभियान।
जनता में आक्रोश
त्योहार पर हुई इस कथित वसूली से जनता आहत है। लोग सवाल कर रहे हैं—
“अगर वर्दी पहनने वाले ही आम नागरिकों को लूटेंगे, तो अपराधियों से फर्क क्या रह जाएगा?”
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