बेतिया / पश्चिम चंपारण — वाल्मीकिनगर विधानसभा से विधायक धीरेन्द्र प्रताप सिंह उर्फ़ रिंकू सिंह का नाम एक बार फिर सुर्खियों में है, लेकिन इस बार विकास कार्यों के लिए नहीं, बल्कि गुंडागर्दी, अवैध कारोबार और हत्या जैसे गंभीर आरोपों के लिए। राजनीति के मंच पर खुद को “जनसेवक” बताने वाले इस नेता पर अब जनता सवाल उठा रही है — क्या यह सेवा की राजनीति है या सत्ता का अपराधीकरण?
सूत्रों के अनुसार, रिंकू सिंह का नाम लंबे समय से बालू माफिया और ठेकेदारी नेटवर्क से जुड़ा बताया जाता रहा है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विधायक के संरक्षण में क्षेत्र में अवैध बालू खनन, सरकारी ज़मीनों पर कब्ज़ा और प्रशासन पर दबाव डालने जैसी गतिविधियाँ जारी हैं। इन सबके बीच, 2021 में हुए दयानंद वर्मा हत्याकांड ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी थी। उस मामले में मृतक की पत्नी ने स्पष्ट रूप से विधायक रिंकू सिंह का नाम आरोपी के रूप में दर्ज कराया था, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई — जिससे “कानून से ऊपर सत्ता” की मानसिकता पर गंभीर सवाल उठता है।
स्थानीय विपक्षी नेताओं का कहना है कि रिंकू सिंह का पूरा नेटवर्क “धन, बल और सत्ता” पर टिका है। चुनाव के दौरान जनता से किए वादे अब सिर्फ भाषणों तक सीमित हैं, जबकि क्षेत्र में भय और दबाव का माहौल कायम है। ग्रामीणों का आरोप है कि अगर कोई रिंकू सिंह के खिलाफ आवाज़ उठाता है तो उसे राजनीतिक या प्रशासनिक दबाव का सामना करना पड़ता है।

विपक्ष का साफ कहना है कि “रिंकू सिंह जैसे नेता लोकतंत्र की जड़ों में जहर घोल रहे हैं। जनता का हक़, जनता की आवाज़ और जनता की ज़मीन — सब सत्ता की भूख में कुर्बान की जा रही है।”
अब सवाल यह है कि आखिर कब तक ऐसे आरोपित चेहरों को जनता प्रतिनिधि का दर्जा देती रहेगी?
जनता अब जागरूक हो रही है, और शायद आने वाले चुनाव में रिंकू सिंह जैसे नेताओं को अपनी करनी का हिसाब देना पड़ेगा।

